Aravalli Hills संकट में, Supreme Court के फैसले पर टिकी नजर

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Aravalli Hills

Aravalli Hills कोई साधारण पर्वत श्रृंखला नहीं हैं। उत्तर भारत में पानी, मौसम और जीवन का संतुलन काफी हद तक इन्हीं पहाड़ियों पर टिका है। यही कारण है कि जब Aravalli Hills का मामला Supreme Court तक पहुंचता है, तो यह सिर्फ कानून की बहस नहीं रह जाती, बल्कि यह तय करता है कि आने वाले वर्षों में पर्यावरण किस दिशा में जाएगा।

आज विवाद इस बात पर केंद्रित है कि Aravalli Hills की पहचान आखिर किस आधार पर तय हो। Ministry of Environment की हालिया रिपोर्ट में यह मान लिया गया है कि केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियां ही Aravalli मानी जाएंगी। कागज पर यह परिभाषा भले ही सरल लगे, लेकिन इसके दूरगामी परिणाम अब सामने आने लगे हैं।

परिभाषा की एक रेखा और उसके बड़े मायने

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि Aravalli Hills को सिर्फ ऊंचाई के पैमाने पर देखना प्रकृति की जटिलता को नजरअंदाज करना है। यह पर्वतमाला एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र है, जहां छोटी पहाड़ियां, जंगल, बरसाती नाले और जलग्रहण क्षेत्र आपस में जुड़े हुए हैं।

aravalli hills

यदि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले हिस्सों को Aravalli से बाहर कर दिया गया, तो वे अपने आप कानूनी सुरक्षा से भी बाहर हो जाएंगे। इसके बाद वहां खनन और निर्माण गतिविधियों का रास्ता खुलना लगभग तय माना जा रहा है।


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अवैध खनन की आशंका क्यों गहराई

हरियाणा और राजस्थान में Aravalli Hills के भीतर अवैध खनन का इतिहास किसी से छिपा नहीं है। बीते वर्षों में न्यायिक दखल के चलते इस पर कुछ हद तक रोक लगी थी। लेकिन अब नई परिभाषा के चलते यह डर फिर उभर आया है कि कई संवेदनशील इलाके दोबारा खनन के दायरे में आ सकते हैं।

Aravalli Hills बारिश के पानी को जमीन में उतारकर भूजल को रिचार्ज करती हैं। यदि ये पहाड़ियां कमजोर होती हैं, तो इसका असर सीधे पानी की उपलब्धता, खेती और स्थानीय मौसम पर पड़ेगा—जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी।


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विरोध की आवाजें और गंभीर चेतावनियां

100 मीटर की सीमा तय होते ही सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का विरोध तेज हो गया। जल संरक्षण के क्षेत्र में दशकों से सक्रिय Rajendra Singh ने Chief Justice of India को पत्र लिखकर चेताया है कि खनन गतिविधियों को छूट देना भविष्य के लिए गंभीर संकट खड़ा करेगा।

उनकी चेतावनी साफ है—Aravalli Hills का नुकसान अपरिवर्तनीय है। एक बार पहाड़ कट गए, तो न पानी लौटेगा और न वह हरियाली, जो पूरे क्षेत्र को सहारा देती है।


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Supreme Court के सामने विकल्प

फिलहाल यह मामला Chief Justice Surya Kant की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच के समक्ष है। अदालत को यह तय करना है कि मौजूदा परिभाषा पर्यावरणीय वास्तविकताओं को सही ढंग से प्रतिबिंबित करती है या नहीं।

कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि अदालत को पुराने आदेशों और मौजूदा हालात में टकराव नजर आता है, तो मामला बड़ी बेंच को सौंपा जा सकता है। साथ ही, खनन गतिविधियों पर सख्त निगरानी या अस्थायी रोक जैसे कदम भी उठाए जा सकते हैं।

मामला सिर्फ Aravalli तक सीमित नहीं

यह फैसला केवल Aravalli Hills के भविष्य का नहीं होगा। Supreme Court का रुख आगे चलकर देश के अन्य पहाड़ी इलाकों, जंगलों और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों के लिए भी नज़ीर बनेगा।

असल सवाल विकास और प्रकृति को आमने-सामने खड़ा करने का नहीं है, बल्कि संतुलन साधने का है। क्या विकास के नाम पर प्राकृतिक सुरक्षा कवच को कमजोर किया जाएगा, या आने वाली पीढ़ियों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी—Aravalli Hills पर होने वाला फैसला इसी सोच की असली परीक्षा है।


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